आस्था पर संवाद विविधता में एकता पर बल देता है

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नई दिल्ली, 6 फरवरी —  भारतीय बहाई समुदाय के ऑफिस ऑफ़ पब्लिक अफेयर्स  ने बहाई उपासना मंदिर में “एकजुट भारत के निर्माण में आस्था की शक्ति का उपयोग” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें विद्वानों, विशेषज्ञों और मीडिया जगत से जुड़े लोगों ने इस बात पर विचार-विमर्श किया कि समकालीन भारत में धर्म किस प्रकार एक जोड़ने वाली शक्ति के रूप में कार्य कर सकता है।

चर्चा की शुरुआत करते हुए, ऑफिस ऑफ़ पब्लिक अफेयर्स, की निदेशक श्रीमती नीलाक्षी राजखोवा ने साझा किया कि यह कार्यालय कई वर्षों से एक न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण में धर्म की भूमिका को लेकर विभिन्न समूहों के साथ संवाद कर रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि जहाँ इतिहास में धर्म ने नैतिक मार्गदर्शन और आचरण की दिशा प्रदान की है, वहीं वर्तमान समय में इसका विभाजन और संघर्ष के स्रोत के रूप में दुरुपयोग भी देखा जा रहा है। ऐसे माहौल में, धर्म के रचनात्मक और एकजुट करने वाले उद्देश्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की आवश्यकता विशेष रूप से तत्काल हो जाती है।

इस सत्र के अध्यक्ष, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर में बहाई चेयर फॉर स्टडीज इन डेवलपमेंट के प्रमुख डॉ. ऑराश फजली ने इस बात पर जोर दिया कि आज धर्म केवल निजी दायरे तक सीमित नहीं है। विशेष रूप से भारत में, आस्था सार्वजनिक जीवन, सामाजिक मूल्यों और राजनीतिक विमर्श को आकार देती आ रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रश्न यह नहीं है कि धर्म को समाज को प्रभावित करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि इसे ऐसा किस प्रकार करना चाहिए। इसकी शक्ति को संकीर्ण हितों द्वारा संचालित होने देने के बजाय, नागरिकों और संस्थानों को एकता और सामाजिक सामंजस्य को मजबूत करने के लिए सचेत रूप से धर्म के नैतिक मूल का उपयोग करना चाहिए।

वसुधैव कुटुम्बकम जैसे आदर्शों का संदर्भ देते हुए और समावेशी राष्ट्र-निर्माण के लिए धार्मिक कल्पनाशीलता का उपयोग करने के महात्मा गांधी के प्रयासों को याद करते हुए, इस चर्चा ने सीमाओं से परे जाने, करुणा को बढ़ावा देने और सामूहिक जिम्मेदारी को प्रेरित करने की आस्था की क्षमता पर प्रकाश डाला। यह नोट किया गया कि इस रचनात्मक जुड़ाव में न केवल धार्मिक नेताओं को, बल्कि व्यक्तियों, समुदायों और मीडिया, न्यायपालिका, शिक्षा प्रणाली व राज्य जैसी संस्थाओं को भी शामिल होना चाहिए।

इस संगोष्ठी में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र में मध्यकालीन और प्रारंभिक आधुनिक इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. रंजीता दत्ता; दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज में दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गीतेश निर्बाण; इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक डॉ. ए. सिरिल, एसजे; और ‘द ट्रिब्यून’ की एसोसिएट एडिटर और ब्यूरो चीफ सुश्री अदिति टंडन शामिल थीं।

प्रो. दत्ता ने प्रतिभागियों को रोजमर्रा के शहरी जीवन में रची-बसी धार्मिक विविधता पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि भारत की मिली-जुली (सांस्कृतिक) परंपराएं शहरीकरण और वैश्वीकरण के बावजूद आज भी हमारे जीवंत अनुभवों को आकार दे रही हैं, जो यह दर्शाता है कि एकीकरण अक्सर साझा दैनिक स्थानों से ही विकसित होता है। एकता की स्वाभाविक प्रकृति पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, “जब हम धार्मिक एकीकरण की बात करते हैं, तो हमें धार्मिक विविधताओं की भी बात करनी होगी। इन्हीं विविधताओं के माध्यम से—और उनके बीच रहने व चलने-फिरने के हमारे रोजमर्रा के अनुभवों के माध्यम से ही—धार्मिक एकीकरण का विचार धीरे-धीरे आकार लेता है।”

भारतीय दार्शनिक परंपराओं का हवाला देते हुए, डॉ. गीतेश निर्बाण ने वसुधैव कुटुम्बकम और अद्वैत जैसी अवधारणाओं पर विचार किया और समकालीन चुनौतियों का समाधान करते समय भारत की बौद्धिक विरासत की ओर रुख करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने उल्लेख किया, “जब हम धर्म पर चर्चा कर रहे हैं, जब हम एक एकजुट भारत की बात कर रहे हैं, और जब हम धर्म के आसपास उत्पन्न होने वाले मुद्दों की जांच कर रहे हैं, तो हमारे लिए उन अवधारणाओं को देखना महत्वपूर्ण है जो हमारा मार्गदर्शन कर सकती हैं—ऐसी अवधारणाएं जो गहरा दार्शनिक महत्व रखती हैं।” उन्होंने समझाया कि स्वीकार्यता केवल सहिष्णुता से परे की बात है; यह भिन्नता को एक खतरे के रूप में देखने के बजाय एक समृद्धि के रूप में पहचानती है, और एकता को एक साझा चेतना में स्थापित करती है।

मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से, डॉ. सिरिल ने इस बात पर जोर दिया कि आस्था को राजनीतिक एजेंडों की पूर्ति करने के बजाय अपने नैतिक मूल में “दृढ़” रहना चाहिए, जो गरिमा, सेवा और आपसी देखभाल को बढ़ावा दे।

सुश्री टंडन ने भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने पर प्रकाश डाला, जो अपनी अनेक भाषाओं, धर्मों और समुदायों की विशेषता लिए हुए है। उन्होंने उल्लेख किया कि प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाली भिन्नताओं के बावजूद, एक गहरी आध्यात्मिक एकता राष्ट्र को बांधे रखती है, जो एक अमूल्य विरासत का निर्माण करती है और इसकी रक्षा की जानी चाहिए।

संगोष्ठी का समापन इस साझा समझ के साथ हुआ कि आस्था को जब सचेत रूप से जन-कल्याण की ओर निर्देशित किया जाता है, तो यह एकजुटता को मजबूत कर सकती है और एक एकजुट भारत के निर्माण में मदद कर सकती है। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि धर्म की सच्ची शक्ति भिन्नता को सिद्ध करने में नहीं, बल्कि नैतिक कार्रवाई, करुणा और एक साझा नियति की भावना को विकसित करने में निहित है।