कुराउनी, बाँथरा, उत्तर प्रदेश | 5 जुलाई 2026 — उत्तर प्रदेश के बाँथरा स्थित कुराउनी में 40 स्थानीय किसानों की एक संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें सतत कृषि पद्धतियों, पर्यावरण संरक्षण और कृषक समुदायों के दीर्घकालिक कल्याण पर चर्चा की गई। इस कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को आज कृषि के समक्ष आ रही चुनौतियों पर परामर्श करने तथा अधिक लचीली और सतत कृषि प्रणालियों के निर्माण के लिए व्यावहारिक समाधानों का आदान-प्रदान करने का एक मंच प्रदान किया।
इस संगोष्ठी का आयोजन कुराउनी, बाँथरा की स्थानीय आध्यात्मिक सभा द्वारा किया गया था, जो बहाई समुदाय की निर्वाचित स्थानीय शासी संस्था है, जो एकता, सामाजिक प्रगति और समाज के आध्यात्मिक तथा भौतिक विकास को बढ़ावा देने के लिए कार्य करती है।
चर्चाएँ गहन रासायनिक खेती के बढ़ते प्रभावों पर केंद्रित थीं, जिनमें घटती मिट्टी की उर्वरता, खेती की बढ़ती लागत, किसान परिवारों पर वित्तीय दबाव और आजीविका के रूप में कृषि को अपनाने के प्रति युवा पीढ़ी की बढ़ती अनिच्छा शामिल हैं।
प्रतिभागियों ने गोबर की खाद, वर्मीकंपोस्ट और जीवामृत जैसी सतत कृषि पद्धतियों को अपनाकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के व्यावहारिक विकल्पों को साझा किया। मृदा स्वास्थ्य में सुधार, पर्यावरण की सुरक्षा, इनपुट लागत को कम करने और स्वस्थ खाद्य उत्पादन का समर्थन करने की उनकी क्षमता के लिए इन दृष्टिकोणों पर विशेष बल दिया गया।
इस परामर्श ने कृषि और सामाजिक चुनौतियों से निपटने में किसानों के बीच सहयोग, सामुदायिक भागीदारी और नैतिक मूल्यों के अनुप्रयोग के महत्त्व पर भी ज़ोर दिया। प्रतिभागी इस बात पर सहमत हुए कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए न केवल पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों की आवश्यकता है, बल्कि मजबूत स्थानीय सहयोग, ज्ञान-साझाकरण और वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के कल्याण के प्रति साझा प्रतिबद्धता की भी आवश्यकता है।
संगोष्ठी का समापन प्रतिभागियों द्वारा सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने और सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से अपने समुदायों के लचीलेपन को मजबूत करने में एक-दूसरे का समर्थन करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने के साथ हुआ।


