"दिव्य शिक्षक और धर्म की प्रकृति तथा उद्देश्य" विषय पर अंतर्धार्मिक संवाद

Interfaith Dialogue on ‘The Divine Educators and the Nature and Purpose of Religion

भारत के बहाई जन-सम्पर्क कार्यालय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार, के सहयोग से ‘दिव्य शिक्षक और धर्म की प्रकृति तथा उद्देश्य’ विषय पर एक अंतर्धार्मिक संवाद का आयोजन किया। बहाई धर्म के युगल अवतारों – बाब और बहाउल्लाह – की जयन्ती मनाने के लिए यह कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के कार्यालय में आयोजित किया गया था।

इस सभा की अध्यक्षता राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के माननीय अध्यक्ष श्री इकबाल सिंह लालपुरा ने की तथा इस अवसर पर आयोग के एक अन्य सदस्य श्री धन्यकुमार जिनप्पा गुंडे भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के वक्ताओं ने भाग लिया जिनमें देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में बहाई विकास अध्ययन पीठ के प्रमुख डॉ. अराश फजली; ‘इंटरफेथ हार्मोनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. ख्वाजा इफ्तिख़ार अहमद; टैगोर नेशनल फेलो, राष्ट्रीय संग्रहालय के भारतीय धर्म के प्राध्यापक प्रोफेसर मधु खन्ना; सद्भाव और शांति अध्ययन संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. एम. डी थॉमस; जुडाह हयाम सायनागॉग के मुख्य पुजारी रब्बी ईजेकियल मालेकर; जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर; पारसी जोरास्ट्रियन समुदाय के प्रतिनिधि डॉ. शेरनाज कामा, तिब्बत हाउस के श्री लोकेश जिंदल और ओम शांति रिट्रीट सेंटर, गुरुग्राम, की सिस्टर हुसैन शामिल थीं।

अपने आरंभिक भाषण में बहाई जन-सम्पर्क कार्यालय की निदेशक सुश्री नीलाक्षी राजखोवा ने संकट और विजय के विषय पर चर्चा की, जो कि बाब और बहाउल्लाह सहित सभी दिव्य शिक्षकों के जीवन की विशेषता थी। उन्होंने प्रतिभागियों का ध्यान इस सभा के लिए तैयार किए गए कॉन्सेप्ट नोट में पूछे गए प्रश्नों पर केंद्रित किया, जिसमें पूछा गया था – दिव्य शिक्षकों की एकता और उनके उद्देश्य की चेतना को कैसे पहचाना और प्रचारित किया जा सकता है? और उनके संदेश को आज के समाज की जरूरतों से कैसे जोड़ा जा सकता है?

अपनी टिप्पणियों में, वक्ताओं ने बच्चों और युवाओं को विश्वव्यापी मूल्यों में शिक्षित करने, धर्म की एकता पर परिसंवाद के स्तरों को बढ़ाने, सच्चे दिव्य शिक्षकों को गलत उद्देश्यों के लिए धर्म का उपयोग करने वालों से अलग करके पहचानने की जरूरत और पूर्वाग्रहों को दूर करने तथा घृणा भरे भाषण को रोकने के लिए अंतर-धार्मिक समझ बढ़ाने की आवश्यकता पर चर्चा की। अपने समापन भाषण में, श्री लालपुरा ने इस तरह के अंतर्धार्मिक संवाद के अपार महत्व और भारत के सामने खड़े समकालीन मुद्दों को संबोधित करने के लिए सभी धर्म प्रतिनिधियों द्वारा एकजुट रुख अपनाने की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने और अधिक अंतर्धार्मिक परिसंवादों के आयोजन की आवश्यकता पर जोर दिया जो इस बात को रेखांकित करते हैं कि धर्मों की शिक्षाएं देश के विकास सम्बंधी मुद्दों को कैसे संबोधित कर सकती हैं।