दूसरों का अधिक ध्यान रखने वाले समाज के निर्माण के लिए आर्थिक संरचनाओं का रूपांतरण

economic structures be transformed

इंदौर, भारत — आर्थिक संरचनाओं को किस तरह रूपांतरित किया जा सकता है ताकि वे मानवजाति की अंतर्निहित अंतर्निर्भरता और प्रतियोगिता की जगह आपसी सहयोग की क्षमता की बेहतर झलक दिखा सकें? देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में बहाई विकास अध्ययन-पीठ (बहाई चेयर फॉर स्टडीज़ इन डेवलपमेंट) द्वारा हाल ही में आयोजित एक संगोष्ठी में इसी प्रश्न पर विमर्श किया गया।

“अधिक संवेदनापूर्ण भारत के निर्माण के लिए आर्थिक संरचनाओं में रूपांतरण” शीर्षक परिचर्चा में अपने प्रारंभिक वक्तव्य में बहाई चेयर के प्रमुख अराश फ़जली ने कहा: “एक सच्ची संवेदनापूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए यह समझना आवश्यक होगा कि मनुष्य केवल दैहिक आवश्यकताओं वाला भौतिक प्राणी नहीं हैं, बल्कि वह एक आध्यात्मिक प्राणी है जो दूसरों की सेवा के माध्यम से उत्कृष्ट गुणों का विकास करने में सक्षम है।”

अधिक से अधिक ध्यान रखने वाले यानी संवेदनापूर्ण विश्व के निर्माण के कतिपय अभिप्रायों की परख करने वाली श्रृंखला की यह तीसरी संगोष्ठी थी जिसका आयोजन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र स्कूल के सहयोग से बहाई विकास अध्ययन-पीठ द्वारा किया गया था। फोरम में अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और विकास के क्षेत्र में काम करने वालों को एकजुट किया गया ताकि यह परखा जा सके कि आर्थिक प्रणालियां सामाजिक रूपांतरण के लिए आवश्यक आध्यात्मिक क्षमताओं को बढ़ावा देते हुए लोगों का ध्यान रखने के कार्य को बेहतर ढंग से कैसे पहचान सकती हैं और कैसे उन्हें महत्व दे सकती हैं।

प्रतिभागियों को वितरित किए गए एक पेपर में बहाई अध्ययन-पीठ द्वारा यह बताया गया कि वर्तमान आर्थिक संरचनाएं प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ पर जोर देकर किस तरह अक्सर मानवजाति की एकता के मूल सिद्धांत के विरुद्ध काम करती हैं।

एक ओर जहां वर्तमान आर्थिक संरचनाएं वस्तुओं और सेवाओं के वितरण में कुशल हो सकती हैं, वहीं दूसरी ओर वे अक्सर ध्यान रखने की क्रिया अर्थात उस श्रम को कम महत्व देती हैं जो मानव जीवन को अक्षुण्ण बनाए रखने और मनुष्य की अंतर्निहित क्षमता को विकसित करने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह अवमूल्यन ऐसी स्थितियों को कायम रखता है जहां लोगों का ध्यान रखने का काम, जो मुख्य रूप से महिलाओं और आर्थिक रूप से वंचित समूहों द्वारा किया जाता है, सामाजिक और आर्थिक असमानता का स्रोत बन जाता है।

पेपर में इस बात पर जोर दिया गया है कि इन संरचनाओं में बदलाव लाने के लिए मानव जीवन के आध्यात्मिक पहलू को पहचानना तथा आर्थिक जीवन में प्रेम, आपसी सम्बंध और विश्वासपात्रता जैसे गुणों की अनिवार्य भूमिका को मान्यता देना आवश्यक है।