विगत 4 अक्टूबर 2024 को भारत के बहाइयों के राष्ट्रीय जन-सम्पर्क कार्यालय तथा ह्यूमन राइट्स डिफेंस इंटरनेशनल (HRDI) द्वारा नई दिल्ली स्थित बहाई उपासना मंदिर में ‘कानून, समाज और सामाजिक चेतना’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री मनमोहन द्वारा दिया गया और इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे भारत के एटॉर्नी जनरल श्री आर. वेंकटरामणि।
माननीय न्यायमूर्ति श्री मनमोहन ने अपने संबोधन में कानून, न्याय और सामाजिक चेतना के बीच के गहन सम्बंध पर प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका की भूमिका केवल कानून की व्याख्या करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वह समाज की क्रमिक रूप से विकसित होती आवश्यकताओं के अनुरूप हो। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि संविधान एक “जीवंत दस्तावेज़” है जो न्यायाधीशों को समकालीन मुद्दों के अनुसार इसके प्रावधानों को अनुकूल बनाने का लचीलापन प्रदान करता है। उन्होंने समझाया कि यह अनुकूलनशीलता यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि न्याय न केवल दिया जाए बल्कि लोगों द्वारा महसूस भी किया जाए।
न्यायमूर्ति मनमोहन ने उल्लेख किया कि संविधान के अनेक प्रावधान, जैसे कानून के समक्ष समानता के बारे में अनुच्छेद 14, व्याख्याकार की सामाजिक चेतना के आधार पर व्याख्या के लिए खुले हुए हैं। उन्होंने कहा कि, “आपके सामने केवल कानून के अक्षर नहीं हैं बल्कि आपको उसमें जान भी डालनी होगी।” उन्होंने आगे विस्तार से समझाया कि संविधान-निर्माताओं की वास्तविक मंशा को साकार करने के लिए कानून और सामाजिक जागरूकता का एकीकरण आवश्यक है।
अपने बचपन में कला की कक्षाओं से एक उदाहरण का प्रयोग करते हुए, उन्होंने कहा कि संविधान की व्याख्या करना कच्ची मिट्टी के साथ काम करने जैसा है जिसमें परिणाम व्यक्ति के दृष्टिकोण और उसकी रचनात्मकता पर निर्भर करता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी स्थिति में भी जबकि मूल पाठ में पर्यावरण संरक्षण या सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी कुछ आधुनिक चिंताओं का स्पष्ट रूप से समावेश न किया गया हो, संविधान को इस तरह से आकार देने में न्यायाधीश महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि वह सामाजिक परिवर्तनों को झलका सके।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि न्यायिक प्रक्रियाओं में सामाजिक चेतना का होना बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर उन मामलों में जिनमें विवेक-निर्णय की आवश्यकता होती है, क्योंकि इससे सामाजिक रूप से संवेदनशील और समाज की वास्तविकता झलकाने वाला न्याय सुनिश्चित करने में मदद मिलती है। इस अवसर पर अपने स्वागत भाषण में, भारत के बहाइयों की राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा की महासचिव सुश्री नाज़नीन रौहानी ने आज के ज्वलंत मुद्दों को संबोधित करने के लिए भारत के बहाई समुदाय द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला जिनसे जातीय, क्षेत्रीय और धार्मिक विभाजनों से परे, मानवजाति की एकता के प्रति अपनी गहन प्रतिबद्धता के माध्यम से एकीकृत भारत का निर्माण किया जा रहा है। शाम का समापन विविधता में एकता के महत्व पर विभिन्न पवित्र ग्रंथों के पाठ के साथ एक बहुधर्म प्रार्थना सभा के साथ हुआ।


