भारत की राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा ने बुधवार, 2 जुलाई 2025 को बहापुर, नई दिल्ली स्थित बहाई उपासना स्थल के सूचना केंद्र में “सतत विकास के लिए पर्यावरण संरक्षण” पर एक विचारोत्तेजक चर्चा की मेजबानी की। इस कार्यक्रम ने पर्यावरण स्थिरता और सामूहिक कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोगों को एक साथ लाया।
इस शाम को दो प्रतिष्ठित वक्ताओं ने संबोधित किया: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के महासचिव श्री भरत लाल, और एनडीएमसी के अध्यक्ष श्री केशव चंद्र (आईएएस)। उनके संबोधनों ने पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक नैतिक और संस्थागत जिम्मेदारियों पर गहन अंतर्दृष्टि प्रदान की।
श्री भरत लाल ने अपने प्रभावशाली वक्तव्य में पर्यावरण के मुद्दों के वैश्विक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा, “आपको एकता के बारे में बात करनी होगी, क्योंकि जलवायु से जुड़े प्रयास सीमाओं पर नहीं रुक सकते। हमें मिलकर काम करना होगा।” उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शासन के समन्वय का आग्रह करते हुए कहा, “आइए हम सद्भाव की आवाज़ों, श्रद्धा की भारतीय परंपरा और आधुनिक नीति की शक्ति को एक ऐसे भविष्य में पिरोएं – जहाँ पर्यावरण प्रदूषित न हो, प्रकृति नष्ट न हो, कोई भी छूटे नहीं, विकास विनाशकारी न हो, और स्थिरता केवल एक नारा नहीं बल्कि एक वास्तविकता हो।”
अपने वक्तव्य में, श्री केशव चंद्र ने एकीकृत प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “योगदान देना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है, क्योंकि केवल कोई एक संस्था ही सब कुछ ठीक नहीं कर सकती या जीवन को टिकाऊ नहीं बना सकती।” उन्होंने आगे साझा किया कि जल एक सामूहिक संपत्ति है और इसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए। वायु प्रदूषण के बारे में बात करते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि सभी देशों के लिए कोई एक ही समाधान काम नहीं कर सकता; बल्कि स्थानीय वास्तविकताओं के अनुरूप एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने रेखांकित किया कि इन पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए लोगों की सामूहिक चेतना को जगाना जरूरी है।
भारत की बहाई राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा की महासचिव सुश्री नाज़नीन रोहानी ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि “वैश्विक कार्यों में, इस तरह के एकीकृत प्रयासों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र इस ग्रह के संसाधनों का संरक्षण करना है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एकता और सहयोग पर आधारित वैश्विक समाधानों की आवश्यकता है। सतत विकास को एक समग्र प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने प्रणालीगत असमानताओं (सिस्टेमिक इनइक्वलिटीज) को दूर करने और सभी के लिए संसाधनों व अवसरों तक निष्पक्ष पहुंच सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित किया। अपने अंतिम विचार में उन्होंने पुष्टि की कि “न्याय के बिना सतत विकास संभव नहीं है।”
कार्यक्रम का समापन वक्ताओं और प्रतिभागियों के बीच एक व्यावहारिक बातचीत के साथ हुआ, जिसने सहयोग की भावना को बढ़ावा दिया और एक टिकाऊ, समावेशी व न्यायसंगत भविष्य के निर्माण के सामूहिक संकल्प को और मजबूत किया।


