भारतीय बहाई समुदाय के ऑफिस ऑफ़ पब्लिक अफेयर्स ने 30 अगस्त 2025 को बहाई उपासना मंदिर में “स्त्री-पुरुष समानता के लिए प्रयास: शुरुआत घर से हो” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया। इस कार्यक्रम ने अभ्यासकर्ताओं, शिक्षाविदों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को एक साथ लाया ताकि पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता की आधारशिला के रूप में परिवार की भूमिका पर विचार-विमर्श किया जा सके। वक्ताओं में ‘बटरफ्लाईज़ एनजीओ’ की कार्यकारी निदेशक सुश्री रीता पणिक्कर पिंटो; ‘एक्शन इंडिया’ की अध्यक्ष सुश्री वी. कल्याणी; और भारतीय बहाई समुदाय के सार्वजनिक मामलों के कार्यालय के प्रतिनिधि श्री प्रीतम नायक शामिल थे।
चर्चा की शुरुआत समकालीन समाज में परिवारों के बदलते स्वरूप पर पहले वक्ता के विचारों के साथ हुई। परिवार बदल रहे हैं, फिर भी गहराई से समाए हुए स्त्री-पुरुष के अंतर अभी भी बने हुए हैं, जहाँ महिलाएँ देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का अधिकांश बोझ उठाती हैं, जबकि पिता अक्सर इन कार्यों में कम शामिल होते हैं। बच्चों की खुद की सोच और निर्णय लेने की क्षमता को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जो लड़कों और लड़कियों दोनों के पालन-पोषण और उनके कल्याण के सम्मान की आवश्यकता को रेखांकित करता है। रचनात्मक तौर-तरीके, जैसे कि खेलों के माध्यम से पिताओं को जोड़ना, अनौपचारिक पारिवारिक बातचीत को बढ़ावा देना और अहिंसक संचार का उपयोग करना, जैसी बातें साझा की गईं। इन छोटे-छोटे बदलावों ने धीरे-धीरे सामाजिक मानदंडों को बदला, जिससे यह समझ विकसित हुई कि पारिवारिक जीवन का निर्माण सम्मान, सहानुभूति और साझा जिम्मेदारी पर होना चाहिए।
अगले वक्ता ने दशकों के सामुदायिक कार्य से प्राप्त अनुभवों को साझा किया, जो यह दर्शाते हैं कि कैसे परिवारों के भीतर छोटे बदलाव एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव रख सकते हैं। इसमें लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए यौन और प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया, ताकि इससे जुड़े सामाजिक कलंक को मिटाया जा सके और सहमति की संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सके। इन मुद्दों पर चुप्पी तोड़ने से लड़कों और युवा पुरुषों को अपने सवालों को खुलकर सामने रखने, गलतफहमियों का सामना करने और रिश्तों में जिम्मेदारी स्वीकार करने में मदद मिली है। अंतर-पीढ़ीगत संवाद, चाहे वह सास और बहू के बीच हो या माता-पिता और बच्चों के बीच, पितृसत्तात्मक व्यवस्था को उजागर करने और आपसी समझ को विकसित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं।
संगोष्ठी में स्त्री-पुरुष समानता के गहरे वैचारिक आधारों पर भी चर्चा की गई, जिन्हें अंतिम वक्ता द्वारा साझा किया गया। महिलाओं और पुरुषों की समानता केवल समाज की भलाई के लिए हासिल किया जाने वाला एक सामाजिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह मानवीय वास्तविकता का ही एक रूप है। स्त्री-पुरुष समानता समाज को अधिक न्यायसंगत बनाने के लिए कृत्रिम रूप से तैयार की गई कोई चीज़ नहीं है; बल्कि यह उस सच्चाई को स्वीकार करना है जो पहले से मौजूद है, भले ही वह स्थापित रूढ़िवादी ढांचों द्वारा धुंधली या दबा दी गई हो। इस बात पर भी जोर दिया गया कि जो परिवार केवल अपने आप में सीमित रहता है, वह सिर्फ स्वार्थी निष्ठाओं को बढ़ावा देने का जोखिम उठाता है, जबकि एक बाहरी दुनिया से जुड़ा (आउटवर्ड-लुकिंग) परिवार सामाजिक कल्याण में योगदान देता है और समानता के अभ्यास का एक मंच बनता है। परिवार आपसी घनिष्ठता और दूसरों की सेवा करने की सच्ची इच्छा के माध्यम से ऐसे जीवंत घर बना सकते हैं, जो सामाजिक परिवर्तन के सक्षम नायकों का निर्माण करें और पड़ोसियों व दोस्तों के साथ सार्थक बातचीत में शामिल हों।


