दुनिया भर में धार्मिक उन्माद, कट्टरता और पूर्वाग्रह का जिस खतरनाक तरीके से उभार हुआ है उसने यह अत्यावश्यक बना दिया है कि धर्म की ऐक्यकारी और रचनात्मक प्रकृति को और अधिक गहराई से जाना और समझा जाए। भारत के बहाइयों की राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा के जन-सम्पर्क कार्यालय द्वारा 3 अगस्त को आयोजित की गई संगोष्ठी का यही उद्देश्य था, जिसका शीर्षक था: “एकता से बंधे भारत की रचना के लिए धर्म की शक्ति से प्रेरणा ग्रहण करना”। धार्मिक मत किसी भी राष्ट्र के जीवन में किस प्रकार एक रचनात्मक भूमिका निभाता है तथा व्यक्तिगत एवं सामुदायिक जीवन पर उसके स्वस्थ प्रभाव को निरंतर जारी रखने के लिए कौन-कौन सी शर्तें आवश्यक हैं इन विषयों पर विचार-विमर्श के लिए इस कार्यक्रम में भारत के चार विद्वान समाजविज्ञानी एकत्रित हुए। इनमें से एक वक्ता ने यह विचार प्रकट किया कि सभी धर्मों के मूल में जो सच्चाइयां निहित हैं उन्हें फिर से दोहराया जाना आवश्यक है – यह कि इस सम्पूर्ण सृष्टि का उद्गम एक ही आध्यात्मिक स्रोत से हुआ है, यह आध्यात्मिक स्रोत सभी मानवों और सम्पूर्ण सृष्टि के बीच के आपसी सम्बंध की महानतम और सबसे मजबूत कड़ी है, और यह कि सृष्टि के मूल में निहित पावनता हमारे भीतर विनम्रता, प्रेम और उदारता के गुणों के सृजन के लिए प्रेरित करती है। विद्वान महोदय ने रेखांकित किया कि आध्यात्मिकता की ओर हमारी यह वापसी अत्यधिक स्वार्थपरता, व्यक्तिवाद, प्रतिस्पर्द्धा और दुनिया में व्याप्त लोभ-लालच की सबसे बड़ी रामवाण दवा है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जनसमूहों के कल्याण को प्रभावित करने वाली नीतियों के निर्माण में आध्यात्मिक सिद्धान्तों को लागू करने की परम आवश्यकता पर भी चर्चा की।
एक अन्य विद्वान वक्ता ने कहा कि ऐसे अनेक मामलों को देखते हुए जबकि धर्म को आपसी कलह का बहाना बना दिया जाता है, सभी धर्मों में निहित प्राथमिक सिद्धान्तों को तलाशने और उन पर जोर देने के लिए परिसंवाद आरंभ करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने इन सिद्धान्तों की पहचान अन्य मनुष्यों और प्रकृति के साथ जुड़ाव, सहानुभूति और करुणा की भावना के रूप में की। जरूरत इस बात की है कि धार्मिक होने का दावा करने वाले सभी बयानों और कार्यों को इन्हीं सिद्धान्तों की कसौटी पर कसा जाना चाहिए।
एक तीसरे वक्ता ने उन नियमों और मूल्यों के स्रोत के रूप में धर्म के महत्व के बारे में विचार किया जिनकी जरूरत समाज को अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को कायम रखने के लिए है। इन नियमों के बिना वह विश्वास और सद्भावना ही नष्ट हो जाएगी जिन पर स्वस्थ सामाजिक एवं आर्थिक सम्बंध निर्भर हैं।
चौथी वक्ता ने, जो कि राजनीतिशास्त्र की एक सेवानिवृत्त प्राध्यापिका थीं, इस बात पर जोर दिया कि धर्म के आध्यात्मिक सिद्धान्तों की शिक्षा उन परम्पराओं और प्रथाओं के माध्यम से मिलती है जो वस्तुतः कुछ विशेष उद्देश्यों को पूरा करती हैं। चुनौती यह है कि समय बीतने के साथ इन धार्मिक परम्पराओं का उन आध्यात्मिक सिद्धान्तों और सामाजिक उद्देश्यों से सम्बंध टूट गया है जिनके लिए उन परम्पराओं की रचना की गई थी। उन्होंने न केवल धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं की इस समग्रता को फिर से बहाल करने बल्कि उन वक्तव्यों और कार्यों से जो कि वास्तव में धर्म का हिस्सा थे, उन रिवाज़ों को अलग करने के लिए भी संवाद का आह्वान किया जिनका वर्तमान समय में न तो कोई महत्व है और न ही जिनसे कोई रचनात्मक प्रभाव पड़ता है।


