प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा की 100वीं वर्षगांठ पर शुभकामनाएं अर्पित कीं

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यह वर्ष मील का एक पत्थर साबित हुआ क्योंकि भारतीय बहाई समुदाय का प्रतिनिधित्व और उसके मामलों का प्रशासन करने वाली, लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा ने अपनी स्थापना की 100वीं वर्षगांठ मनाई।

इस अवसर को स्मरणीय बनाने के लिए “कमल मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध बहाई उपासना मंदिर के प्रांगण में 21 मार्च 2024 की संध्या को एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में सरकारी विभागों, राजनय और समाज के अन्य तबकों से ढाई सौ से भी अधिक संख्या में विशिष्ट अतिथियों ने भाग लिया। 

कार्यक्रम के दौरान, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भारत की राष्ट्रीय बहाई आध्यात्मिक सभा को संबोधित संदेश पढ़कर सुनाया गया। राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा की शतवार्षिकी का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री महोदय ने कहा कि “भारत में धार्मिक विविधता और समावेशन के जीवन्त परिदृश्य में यह मील का एक महत्वपूर्ण पत्थर है”। भारत के बहाइयों के “ऐतिहासिक योगदान” को स्वीकार करते हुए श्री मोदी ने अपने संदेश में “स्त्री-पुरुष की समानता के पक्ष-समर्थन, विश्वव्यापी शिक्षा, और आधारभूत स्तरों पर समुदाय-निर्माण के प्रयासों…” में बहाई समुदाय के योगदानों पर जोर दिया। उन्होंने नई दिल्ली के बहाई उपासना मंदिर का विशेष रूप से उल्लेख किया जो कि, उनके शब्दों में, “आध्यात्मिक रूपांतरण के एक व्यापक रूप से स्वीकृत प्रतीक” और “आंतरिक शांति और सौहार्द के चिह्न” के रूप में उभर कर सामने आया है। विशिष्ट अतिथि के रूप में ‘इंडिया फाउंडेशन’ के अध्यक्ष, डॉ. राम माधव, ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बहाई धर्म का सार-तत्व “न्याय के बारे में” है और यह कि बहाइयों का एक “व्यापक वैश्विक दृष्टिकोण” है और यही कारण है कि भारत के लोग, जो विविधता को स्वीकार करते हैं और एकता के लिए प्रतिबद्ध हैं, “आसानी से इस धर्म से जुड़ जाते हैं”। भारत के बहाइयों की राष्ट्रीय आध्यात्मिक सभा की महासचिव, सुश्री नाज़नीन रौहानी, ने अपने संबोधन में भारत में बहाई समुदाय के क्रमिक विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया और पिछले सौ वर्षों में राष्ट्रीय सभा द्वारा निभाई गई भूमिका पर प्रकाश डाला।